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अजनबी इश्क की अजनबी सी बात है,अजनबी सी खुशी अजनबी जज्बात है..!!
उसके बदलने से मेरे संभलने तक का ये सफर,, मुझे बेहतर से बेहतरीन कर गया..!!
मेरे ना हो सको तो कुछ ऐसा कर,, दो मैं जैसा था मुझे वैसा कर दो..!!
आज की रात यू थमी सी है,, आज फिर तुम्हारी कमी सी है..!!
उल्फत की बात है जरा सलीके से कीजिए,, सड़को पे हाथ पकड़कर मोहब्बत नहीं होती..!!
मैं चांद को सुनाता हूं अक्सर हाले दिल अपना,, मैं जमीनजादों पर अब भरोसा नहीं करता..!!
तुम जमाने कि बात करते हो,, मेरा मुझसे भी फासले है बहुत..!!
बहुत भीड़ है इस मोहब्बत के शहर मे,, एक बार जो बिछड़ जाए दोबारा नही मिलता..!!
कहानी जिंदगी की यही है की इसमें,, मनचाहा किरदार नही मिलता..!!
कोन है जिसमे कमी नही है,, आसमां के पास भी तो जमीं नही है..!!
अब लगता है ठीक कहा था गालिब ने बढ़ते बढ़ते दर्द दवा हो जाता है.!
हज़ारो बार उसे समझाने से अच्छा है, एक बार खुद को समझा लेना.!
उजाले वाली दुनिया अलग दिखती है अंधेरे में।
हैरत करूँ, मलाल करूँ, या गिला करूँ,, तुम गैर लग रहे हो बताओ मैं क्या करूँ..!!
बिछड़ते वक़्त तो आवाज़ ही बैठ जाती है,, उसे लगा था के मैंने उसे आवाज़ ही नहीं दी..!!
यूँ भी हुआ रात को जब सब सो गए,, तन्हाई और मैं तेरी बातों में खो गए..!!
....कम लोग हों साहब, पर अपने हों ।....जिन्दगी तमाशा थोड़ी है जो भीड़ चाहिए ।।
....खुली किताब के सफ़्हे उलटते रहते हैं ।....हवा चले न चले दिन पलटते रहते हैं ।।
....बहुत जरूरी नहीं हूं मैं मगर साहब ।....मेरे बिना कुछ कमी तो जरूर रहेगी ।।
.... या तो ख़रीद लो या खारिज़ कर दो साहब ।.... ये सहूलियत के हिसाब से किराये पर मत लिया करो मुझे ।।
.... मेरी रूह तक गया वो ।.... मुझे रूह तक तोड़ने के लिए ।।
.... ख्वाहिशों के बोझ में बशर तू क्या _ क्या कर रहा है ।... इतना तो जीना भी नहीं है जीतना तू मर रहा है ।।
.... क्या होता है रिश्तों का वजन ये उन कंधों से पूछो साहब ।.... जिन्होंने बस्ते उठाने की जगह जिम्मेदारियां उठाई हैं ।।
....घटाएं आ चुकी है आसमां पर दिन ओर भी सुहाने है ।....मेरी मजबूरी तो देखो मुझे बारिश में भी कागज कमाने है ।।
....बिना सफ़र बिना मंजिल का एक रास्ता होना चाहता हूं ।....कहीं दूर किसी जंगल में एक ठहरा दरिया होना चाहता हूं ।।
....एक ज़िंदगी होना चाहता हूं बिना रिश्तों और रिवाजों की ।...दूर आसमान से गिरते झरने में कहीं खोना चाहता हूं
.... काश कोई ऐसा हो जो गले लगा कर कहे ।.... तेरे दर्द से मुझे भी तकलीफ होती है ।।
.... कुछ तो बदला है । साहब मैं तुम...या फिर वक्त ।।
....क्यूँ दें सफ़ाई हम । ....बस बुरे हैं सहाब बात खत्म ।।
....कभी_कभी दिल को बहला लेना सही होता है ।.... हर ज़िद हमे सुकुन नही देती साहब ।।
.... बहुत दिनों बाद आज मेरा दिल ये सोच कर रो दिया ।.... ऐसा क्या पाना था मुझे जो मैंने खुद को ही खो दिया ।।
.... बहुत कोशिश की मैंने उसको समझाने की ।.... फिर एक रोज़ मैंने खुद को समझा लिया ।।
.... ज़िंदगी बोझ तो नही लेकिन ।.... जाने क्यों थका दिया इसने ।।
.... ज़ख्म अल्फाज़ से ही दे देते हैं लोग ।.... अब यहां खंजर की ज़रूरत कहां है ।।
.... वो मस्ज़िद की खीर भी खाता है, मन्दिर का लड्डू भी खाता है।.... वो भूखा है साहब उसे मज़हब कहां समझ में आता है।।
.... बड़े ही अजब कायदे हैं मेरे देश के साहब।.... यहां भूख से ज्यादा धर्म पर बहस होती है।।
.... तुम पर मरने से तो अच्छा था साहब।.... हम किसी हादसे में मर जाते।।
.... बुरा तो हर कोई है मेरे दोस्त।.... फरिश्ते ना तुम हो ना हम हैं।।
.... चेहरे देख कर दिल लगाया ही नहीं कभी ।.... हां मुस्कुराहटों पर तेरी कई बार जान लुटाई हमने।।
.... साखें रहीं तो फूल भी पत्ते भी आयेंगे ।.... ये दिन अगर बुरे हैं तो अच्छे भी आयेंगे ।।
.... लोट कर नहीं आयेंगे हम दोबारा।.... जरा सोच कर खोना हमे।।
....तेरे चेहरे की दरारें तो ... कुछ भी नहीं ।....ये चाहत के खेल हैं...पूरे इंसान_निगल जाते हैं।।
.... गलतियां तो बहुत सी हुई ज़िंदगी में साहब। लेकिन .... जो गलतियां लोगों को पहचान ने में हुईं उनका नुकसान सबसे ज्यादा है।।
.... बेटा खुद कमाने लगा तो समझ आया।.... बाप ने बाप का किरदार कैसे निभाया ।।
... सस्ती चीजें और घटिया लोग।.... शूरू में हमेशा अच्छे लगते हैं।।
.... वो जो थोड़ा सा भी किसी और का है। .... वो मुझे जरा सा भी नहीं चाहिए।।
....एक शख़्स दूर से बेहद सुंदर लगा मुझें ।....पास से देखा तो एक खंज़र लगा मुझें।।
....बातों से इश्क़ के बग़ीचे का माली था।....दिल में देखा तो बेहद बंज़र लगा मुझें।।
....किसी एक से मोहब्बत उसकी फ़ितरत में नहीं।....वो मासूम चेहरा बड़ा सितमगर लगा मुझें।।
....सीख नहीं पा रहा हूं मीठा झूँठ बोलने का हुनर।....कड़वे झूंट ने मुझसे जाने कितने लोग छीन लिए।।
.... छप के बिकते थे जो अख़बार सूना है इन दिनों।.... वो बिक कर छप रहे हैं।।
....गरीब बाप के मेहनत गुज़ार बेटे हैं हम ।....हमारे सपनों में शहजादिया नहीं आती हैं !!
.... क्या होता है रिश्तों का वजन उन कंधों से पूछो ।.... जिन्होंने बस्ता उठाने की उम्र में जिमेदारियाँ उठाई हैं ।।
....आशिक़ी में हमने ये जाना ।....इश्क़ से बेहतर है मर जाना ।।
....Uthe Ga Phir Sawaal Sabhi Pe WaffaaoN Ka.....Mehshar mieN Phir Lagey Gi Adalat HUSSAIN (as) Ki.
....Thha Pyaas Ke HaathoN mieN Idhr Fatah Ka ParCham.....Dariya Udhr Haare huwe LaShkar mieN Khada Tha.
....Shahenshahe Sahida Ho Anokhi Shaan Waale Ho.....Hussain Ibne Ali Tum Par Sahadaat Naaz Karti Hai.
....Kya Jalwa Karbla Me Dikhaya HUSSAIN ne. Sajde Mein Jaa Ke Saar Ko Ktayaa HUSSAIN ne.....Naize Pe Sar Tha Aur Zubaan Par thi Ayatein QURAN Is taarh Sunaya HUSSAIN ne. ....NANA ke Deen pe har Chiz Waar di Kuch bhi naa Apne Pass Bachayaa HUSSAIN ne.....Kyon AAQA ko naa Apne Nawasee pe Nazz ho Har Qous MUSAFA ka Nibhya HUSSAIN ne.
.... जाने वो कैसे मुकद्दर की क़िताब लिख देता है।.... सांसे गिनती की और ख्वाहिशें बेहिसाब लिख देता है।।
.... अगले मोड़ पर सुकुन होगा।.... आ ज़िंदगी थोड़ा और चलें।।
.... कोई जंग, कोई सर्कस, कोई कहानी कह गया।.... कम ही मिले ए ज़िंदगी तुझको ज़िंदगी कहने वाले।।
....या रब मिरी दुआओं में इतना असर रहे ।...फूलों भरा सदा मिरी बहना का घर रहे ।।
....ज़िंदगी भर की हिफ़ाज़त की क़सम खाते हुए ।....भाई के हाथ पे इक बहन ने राखी बाँधी ।।
.... कुछ अधूरापन था जो पूरा हुआ ही नहीं।... कोई था मेरा जो मेरा हुआ ही नहीं।।
.... दुःख जब इंसान को अंदर से मारने लगता है तो।.... चेहरे पर दिखना बंद हो जाता है।।
.... मैं बचाता रहा दीमक से घर अपना साहब ।.... और चंद कुर्सी के कीड़े पूरा मुल्क खा गए ।।
.... साहब, फिर मुझे कुछ ऐसे भी आजमाया गया।.... पंख काटे गए और मुझे आसमां में उड़ाया गया।।
.... है रूंह को समझना भी ज़रूरी साहब।.... महेज़ हाथों को थामना साथ नही होता।।
.... अपना दर्दे दिल समझने की फुरसत कहां थी साहब।.... हम तो ओरो का दर्द देख कर तड़पते रह गए।।
.... दिल में इंसानियत का होना लाज़मी है साहब ।.... सजदो में पड़े रहने से खुदा नहीं मिलता ।।
.... दौर वह आया है कातिल की सजा कोई नहीं।.... हर सजा उसके लिए है जिसकी खता कोई नहीं।।
.... कहानी जिसकी थी उसके ही जैसा हो गया था मैं।.... तमाशा करते करते खुद तमाशा हो गया था मैं।।
.... आसमानों को जमीनों से मिलाने वाले।.... झूंठे होते हैं ये तक़दीर बताने वाले।।
.... भला तुम्हे भी कोई भूल सकता है।.... भूल गए मुझे, मुझसे ये कहने वाले।।
.... मोबाईल में कुछ नंबर ऐसे भी होते हैं । साहब.... जो ना डॉयल होते हैं और ना डिलीट ।।
.... हमेशा अधूरा ही रहा मेरा सफ़र।.... कभी रास्ते खो गए तो कभी हमसफ़र।।
.... तुमने निकलते हुए देखें होंगे जनाजे अरमानों के साहब।.... अरे हमने तो खुलेआम दफनायी हैं ख्वाहिशें अपनी।।
....हार हो जाती है जब मान लिया जाता है ।....जीत तब होती है जब ठान लिया जाता है ।।
.... हालात सिखा देते हैं बातें सुनना और सहना।.... वरना हर शख्स अपने आप में बादशाह होता है।।
....एक बार अगर सब्र आ जाए साहब तो।....फिर मनपसंद शख्स भी दिल से उतर जाता है।।
.... कभी आहट कभी खुशबू कभी नूर से आ जाती है ।.... आज भी तेरे आने की ख़बर हमें दूर से आ जाती है ।।
.... सिखा दिया है दुनिया ने हर जख्म पर हंसना ।.... ले देख ज़िंदगी अब तुझसे नही डरता मैं ।।
.... दिल तो सब के पास होता है साहब ।.... बस इसके रोग सब को नहीं होते ।।
.... सिर्फ़ छू कर यूं बहक जाने को नहीं साहब।.... उतर कर रुंह में मेहक जाने को इश्क़ कहते हैं ।।
.... बहुत गौर से देखने पर जिन्दगी को जाना मैंने ।.... दिल जैसा दुश्मन जमाने में नही मिलता ।।
.... आज फिर मेरे अल्फाजों ने तुम्हें छूना चाहा ।.... आज फिर इन्हें समझाया कि तुम मेरे नही हो ।।
.... साथ तो ज़िंदगी भी छोड़ देती है ।.... फिर इंसान क्या चीज़ है साहब ।।
.... तुमने जी भर के तो बर्बाद किया है मुझको ।.... और क्या रह गया क्यों याद किया है मुझको ।।
.... अब तुम वापस आ कर क्या करोगे । साहब ... अब हम पहले जैसे तो रहे नही ।।
.... वो बदलेगा दकदीर एक दिन ।.... यारो मेरा भी तो खुदा है ।।
.... मेरा पानी उतरता देख मेरे किनारे पर घर मत बसा लेना।.... मैं समंदर हूं लौट कर वापस जरूर आउंगा।।
.... कोई शहर था जिसकी इक गली, मेरी हर आहट पहचानती थी ।.... मेरे नाम का एक दरवाज़ा था, इक खिड़की मुझको जानती थी ।।
....मुझको बुलाने वालों की उम्रें निकल गईं।....लेकिन मैं तेरे एक इशारे पे आ गया।।
.... जब डूब रही थी कश्ती और दूर था किनारा।.... तब भी भरोसा सिर्फ़ खुदा पर था हमारा।।
.... क्यों ना बेफिकर हो कर सोया जाए ।.... अब बचा ही क्या है जिसे खोया जाए।।
.... शिकायत ना खुद से है ना खुदा से ।.... वो जो भी करता है अच्छे के लिए करता है ।।
.... मैं भी वक्त जैसा हूं साहब।.... कदर ना करने वालों को दोबारा नही मिलता।।
....जिन के किरदार से आती हो सदाक़त की महक । ....उन की तदरीस से पत्थर भी पिघल सकते हैं ।।
....मुस्किल में साथ छोड़ने वाला कितना भी कोई अपना क्यों ना हो....दिल से उतर ही जाता है ।।
.... आता नही है मुझको फरेब बेचना ।.... तभी तो साहब मैं अभी तक फ़कीर हूं ।।
.... हुनर झुकने का मुझमें भी बहुत है मगर ।.... हर चोखट पर सजदा करूं ये मुझे गवार नही ।।
....मस्जिद की मीनारें बोलीं मंदिर के कंगूरों से ।....देश बचा लो किसी तरह नफ़रत वाले लंगूरों से ।।
....मजहब की बातें मेरी समझ में नहीं आती ।...मेरे घर के सामने का मन्दिर एक मुसलमाँ ने बनाया है ।।
.... वो बड़े घर की थी साहब।.... छोटे से दिल में कहां रहती।।
.... अब तबियत पहले जैसी नही रही।.... गलतियां न भी हों तो भी मान लेता हूं।।
.... ये ज़िंदगी है साहब दर्द छुपाना भी पड़ता है।.... और न चाहते हुए भी मुस्कुराना पड़ता है।।
.... की बड़ी मुस्कील से मिला हूं मैं ख़ुद से।.... अब मैं दिल की बातों पर भरोसा नही करता।।
....मेरे रब तू बेशक मुझे अकेला रख पर उन लोगों से मत मिला।....जो ज़िंदगी में आते हैं और खेल कर चले जाते हैं।।
....हालातों ने खो दी इस चेहरे की चमक । वरना ....जहां बैठते थे रौनक लगा दिया करते थे।।
.... जिन्दगी नही रुलाती है रुलाते तो वो लोग हैं ।....जिन्हें हम अपनी जिन्दगी समझ बैठते हैं।।
.... कुछ लोगों को कभी माफ़ नहीं करूंगा ।.... फिर चाहे आह लगे या बद दुआ ।।
....मां ने सिर पर हाथ रखा तब चैन मिला बीमारी में ।....एक मसीहा भी रहता है घर की चार दिवारी में ।।
.... कभी गौर तो कर तू अपनी गलतियों पर ।.... तेरे अपने फैसले पर तेरी नजरें झुक जाएंगी ।।
.... पुरी दुनिया को खफा रहने दो साहब।.... मां बाप अगर खुश हैं तो सिकंदर हो तुम।।
.... किसी ने पूछा क्या करते हो आजकल मैने भी कह दिया.... वफादारी की छोटी सी दुकान है धोखे के बाज़ार में।।
....मैं मिलूंगा तुम्हे उम्र के उस पड़ाव पर भी ।....जहां तुम्हारे अपने भी तुम्हारा साथ छोड़ देंगे।।
